यह वक्त आंदोलन का नहीं देश के साथ खड़े होने का है

देश में कोरोना दुष्काल की दूसरी मारक लहर का कहर जारी है और तीसरी का अंदेशा है , ऐसे में एक बार फिर से  किसान आंदोलन aकी हंगामा खेज चिंता बढ़ाने वाली बात है। यह संभव नहीं है और गले नहीं उतर रही है कि किसान आंदोलन के छह महीने पूरे होने पर काला दिवस मनाने और धरने -प्रदर्शन की गतिविधियां कोविड प्रोटोकॉल के तहत हुई होंगी। ऐसे आवेश के माहौल में संयम की बात करना बेमानी है। दिल्ली की दहलीज पर हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश के किसानों के जमा होने की खबरें चिंताजनक हैं। भले ही शहरों में कोरोना दुष्काल का कहर कम हो गया हो लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों, खासकर पंजाब से संक्रमण की चिंता बढ़ाने वाली खबरें आ रही हैं।
इस संकट काल में ऐसे आयोजनों से संक्रमण की रफ्तार बढ़ने की आशंका है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले महीनों में राज्यों के चुनावों के दौरान आयोजित रैलियों व धार्मिक आयोजनों से स्थिति खराब ही हुई है। लेकिन तथ्य यह भी है कि किसान रबी की फसल की जिम्मेदारी से मुक्त है और खरीफ की बुवाई में अभी समय बाकी है। इस समय को किसान नेता ठंडे पड़े आंदोलन में प्राण फूंकने के अवसर के रूप में देख रहे हैं। जाहिर सी बात है कि कोरोना संकट से जूझने में लगी सरकार का ध्यान आंदोलन की वजह से भटकेगा।
जिस तरह आनन फानन में बारह राजनीतिक दलों ने किसान आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की है, उसके राजनीतिक निहितार्थ समझे जाने चाहिए। ग्यारह दौर की वार्ता, सुप्रीम कोर्ट द्वारा कमेटी बनाया जाना और किसान संगठनों द्वारा उसे गंभीरता से नहीं लेने जैसे घटनाक्रम किसान आंदोलन का हिस्सा रहे हैं। अब नये सिरे से वार्ता को अंजाम तक पहुंचाने की कोशिश होनी चाहिए। जनवरी में खत्म हुई बातचीत से अब आगे बढ़ने की जरूरत है।
 
सरकार ने तीनों विवादित कृषि कानूनों को अगले अट्ठारह माह तक स्थगित करने की बात कही थी, लेकिन किसान इस बात पर अड़े रहे कि तीनों कानूनों को खत्म किया जाये। वे न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा देने तथा स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशों को पूर्ण रूप से लागू करने की मांग करते रहे हैं। केंद्र सरकार को वक्त की नजाकत को समझते हुए अभिभावक की भूमिका निभानी चाहिए। ऐसे वक्त में जब देश की अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है और किसानों को लगता है कि इन सुधारों से उनकी आय में इजाफा नहीं होगा, तो सरकार द्वारा उदारता का व्यवहार किया जाना चाहिए। साथ ही किसानों को भी ऐसे समझौते को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिससे यह संदेश न जाये कि सरकार हारी है।
फैसले किसी पक्ष की जीत-हार से इतर देश के हित में हों। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारों का भी नैतिक दायित्व है कि विरोध के स्वरों को भी तरजीह दी जाये। सरकार को भी जिद छोड़कर व्यावहारिक धरातल की चुनौतियों पर गौर करना चाहिए। यह आंदोलन पंजाब व हरियाणा में ज्यादा प्रभावी है, लेकिन इन मांगों को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। अच्छे माहौल में दोनों पक्ष यदि लचीला रवैया अपनाएंगे तो जरूर कोई सम्मानजनक रास्ता निकलेगा।
 यह आंदोलन ऐसे वक्त में फिर उभरा है जब विपक्ष कोरोना दुष्काल से निपटने में तंत्र की नाकामी बताकर हमलावर है। जाहिरा तौर पर विपक्षी दल किसान आंदोलन के सहारे राजनीति चमकाने की कोशिश करेंगे। मगर ऐसा न हो कि इस नाजुक वक्त में आंदोलन से कोरोना के खिलाफ हमारी लड़ाई कमजोर हो। वह भी तब जब स्वास्थ्य विशेषज्ञ तीसरी लहर आने की आशंका जता रहे हैं। यह भी हकीकत है कि किसानों को लोकतांत्रिक ढंग से शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार है। सरकार को भी बंद बातचीत की प्रक्रिया को शुरू करके अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में बढ़ना चाहिए। दोनों ही पक्षों की ओर से गंभीरता व जिम्मेदारी दिखाने की जरूरत है।

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