दाल के भंडारण की सीमा महंगाई रोक सकेगी ???????

सरकार ने दालों की कुछ किस्मों के नि:शुल्क आयात की अनुमति देने के बाद गत सप्ताह सरकार ने मिल मालिकों, थोक विक्रेताओं, खुदरा कारोबारियों और आयातकों के लिए दलहन के भंडारण की सीमा निर्धारित कर दी। यह सीमा इस वर्ष 31 अक्टूबर तक लागू रहेगी। थोक विक्रेताओं और आयातकों के लिए २०० टन तक भंडारण की सीमा तय की गई है जबकि खुदरा कारोबारियों के लिए पांच टन की सीमा है। प्रसंस्करण करने वालों और दाल मिल मालिकों के लिए यह सीमा अंतिम तीन महीनों के उत्पादन या सालाना क्षमता के २५ प्रतिशत में से जो भी अधिक होगा, उसके बराबर होगी। अप्रैल और मई में दालों की कीमतों में इजाफे के बाद लिए गए इस अदूरदर्शी निर्णय ने कारोबारियों को चौंकाया है और उनमें से कुछ तो हड़ताल पर भी गए क्योंकि उन्हें तय सीमा से अधिक दाल बेचनी होगी। इससे उन्हें घाटा हो सकता है।
इसके साथ कारोबारी तथा अन्य अंशधारक सरकार के खाद्य तेल पर आयात शुल्क कम करने के निर्णय से भी खुश नहीं हैं। इससे पता चलता है कि कैसे सरकार की निर्णय प्रक्रिया अक्सर अल्पावधि के नतीजों पर केंद्रित रही है। उदाहरण के लिए भंडारण सीमा लागू करने का कदम कुछ देर से उठाया गया है क्योंकि कीमतों में वैसे भी कमी आनी शुरू हो गई थी। इतना ही नहीं यह अनिवार्य जिंस (संशोधन) अधिनियम के भी खिलाफ है। यह अधिनियम उन तीन कृषि सुधार कानूनों में से एक है जिन्हें गत वर्ष पारित किया गया था और जिसका कई किसान संगठनों ने भी विरोध किया है। कह सकते हैं कि अगर सर्वोच्च न्यायालय ने कृषि कानूनों पर रोक नहीं लगाई होती तो सरकार भंडारण सीमा निर्धारित करने की स्थिति में नहीं होती।
कीमतें अभी भी पिछले वर्ष से अधिक हैं। इन वक्तव्यों से सरकार के रुख में जो बदलाव प्रकट होता है वह चिंतित करने वाला है। उदाहरण के लिए गत सप्ताह उसने कहा, ‘दलहन जैसी अनिवार्य जिंसों की कीमतें कम रखने के निरंतर प्रयासों के तहत सरकार ने एक ऐतिहासिक आदेश जारी किया है जिसके तहत उसने दलहन के थोक एवं खुदरा विक्रेताओं, मिल मालिकों और आयातकों द्वारा उसके भंडारण की सीमा तय कर दी है।’ यह सितंबर २०२० में विधेयक पारित होने के बाद कही गई बात से एकदम उलट है। उस वक्त सरकार ने कहा था, ‘उत्पादन, भंडारण, वितरण और आपूर्ति की आजादी हासिल होने से कृषि क्षेत्र को आर्थिक लाभ हासिल होंगे और इस क्षेत्र में आकर्षक निजी और विदेशी निवेश आएगा। इससे शीत गृहों और खाद्य आपूर्ति शृंखला के आधुनिकीकरण में भी निवेश आएगा।’
सरकार के निर्णय से न केवल इस क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ी है बल्कि कृषि सुधारों को लेकर उसकी प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठे हैं। यदि सरकार का रुख इतना ही असंगत रहा तो कारोबारी भंडारण और आपूर्ति शृंखला तैयार करने से हिचकिचाएंगे। कीमतों में तेज अस्थिरता की समस्या को बिना व्यापक निवेश के स्थायी रूप से दूर नहीं किया जा सकता। सरकार ने बीते कुछ वर्षों में दलहन के उत्पादन को बढ़ावा देकर अच्छा किया है। इससे उत्पादन बढ़ा है। परंतु आयात को प्रोत्साहन देने और नीतियों के कारण आंतरिक व्यापार में उत्पन्न उथलपुथल का असर उत्पादन पर पड़ सकता था। तुलनात्मक रूप से देखें तो दलहन और खाद्य तेलों जैसी कुछ जिंसों का कम उत्पादन यह भी बताता है कि देश की कृषि नीति में बुनियादी विसंगतियां हैं। यह नीति गेहूं और चावल के उत्पादन पर केंद्रित है। इसे बदलना होगा और कृषि क्षेत्र के उत्पादन में मिश्रण करने से मांग के अनुरूप उत्पादन की दिशा में बढ़ा जा सकता है। हालांकि अहम कृषि सुधार को अप्रत्याशित रूप से पलटने से यही लगता है कि कृषि क्षेत्र में जरूरी बदलाव जल्दबाजी में अंजाम नहीं दिए जा सकते।

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