आज नागपंचमी हैं – भाटखेड़ी के राजघराने से मिली विषेश जानकारी
भाटखेड़ी में विराजित शेषावतार की विशेष गाथा


डॉ बबलु चौधरी
आस्था और विश्वास का प्रतीक है भाटखेड़ी का 1785 ईस्वी का शेषावतार मंदिर
यहां सभी भक्तजनों की इच्छित मनोकामना पुरी होती है
सत्रहवीं शताब्दी के अंत में राजा दुर्जनसाल! सिंह का शासन था। वे बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के राजा थे दिन में अधिकतर समय पूजा पाठ मै व्यतीत करते थे। सन 1783 के चन्द्रावत मराठा युद्ध (रानी अहिल्याबाई की सेना) से दातोली में युद्ध हुआ युद्ध में उनके पिता राजा सालमसिंह भाटखेड़ी व काका ठाकुर विजयसिंह दातोली बुरी तरह घायल हुए। राजा सालमसिंह के निधन के बाद राजा दुर्जनसाल सिंह भाटखेड़ी के राजा बने। उन्होंने ही भगवान देवनारायण का मंदिर भी
विशालकाय नाग-नागिन का जोडा भाटखेड़ी सीमा पर विराजमान है
जनश्रुति के अनुसार भगवान शेषावतार ने उन्हें स्वप्न में आकर आदेश दिया कि मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर तुम्हारे गांव में रहना चाहता हूँ राजा दुर्जनसाल सिंह ने इसे स्वप्न समझकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी अगली रात्रि उन्हें पुनः स्वप्न में दर्शन हुए और आदेश मिला कि मै तेरे राज्य की सीमा पर आ गया हूँ। राजा ने स्वप्न की सत्यता की जांच कराने के लिए घुड़सवारों को भेजा उन्होंने आकर खबर दी कि विशालकाय नाग-नागिन का जोड़ा भाटखेड़ी सीमा पर विराजमान है।
भगवान शेषावतार जहां आकार रुके वही उनका
मंदिर बनवा दिया राजा दुर्जनसाल सिंह ने तुरंत गाव में नगाहे
बजाकर ग्रामीणों को इकट्ठा कर सब पैदल उनके स्वागत को स्थान तक पहुंचे उनका स्वागत कर परभण्डों पर उनको की और पधारने का निवेदन किया भगवान शेषावतार जहाँ आकार रूके वहीं उनका मंदिर बनवा दिया। उक्त जानकारी
भाटखेड़ी राजघराने के दस्तावेज से प्राप्त हुई ग्रामीणों के साथ साथ दूर दूर से श्रद्धालु नागपंचमी पर आस्था व विश्वास से भगवान शेषावतार की पूजा आराधना करते आ रहे है। यहां सभी भक्तजनों की इच्छित मनोकामना पूरी होती है।

Leave a Reply