राजनीति से लेकर व्यवसाय तक हर जगह सक्रिय हैं सिंधी भाषी

  • सिंधी हैं हम….कब होगा हिंदोस्तां हमारा
  • सिंधी समाज को भी उनका हक मिले

विजया पाठक। सिन्ध के मूल निवासियों को सिन्धी कहते हैं। 1947 में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के बाद सिन्ध के अधिकांश हिन्दू और सिख वहाँ से भारत या अन्य देशों में जाकर बस गये। 1998 की जनगणना के अनुसार सिन्ध में 6.5% हिन्दू हैं। सिन्धी संस्कृति पर सूफी सिद्धान्तों का गहरा प्रभाव है। बंटवारे की मार झेलकर महाराष्ट्र पहुंचे सिंधी समाज ने कुछ दशकों में ही अपने परिश्रम, काबिलियत और वाकपटुता के बल पर सफलता का परचम लहराया। व्यापार में अपना लोहा मनवाने वाले समाज के सामने अब असली चुनौती युवा पीढ़ी को सिंधी संस्कृति-संस्कार से जोड़े रखने की है। समाज के प्रबुद्धजनों ने जमीन के मालिकाना हक, अलग राज्य की मांग और नागरिकता के संघर्ष जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

देश के विभाजन के बाद सिंधी भारत में खाली हाथ आए थे। उनके साथ अगर कुछ था, तो तन पर कपड़े, मन में विस्थापन का दर्द, जुबान पर सिंधी भाषा और अपनी सभ्यता व संस्कृति थी। मेहनत के बूते उन्होंने यहां आकर राजनीतिक, सामाजिक, व्यापार और साहित्य के क्षेत्र में अपना सिक्का तो जमा लिया, लेकिन इन सबके बीच उनकी भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी पहचान धूमिल होने लगी। सिंधी समाज के बड़े-बुजुर्गों का मानना है कि उनके समाज में नई पीढ़ी की सिंधी भाषा में रुचि ही नहीं है। इतिहास गवाह रहा है कि जिसकी मातृभाषा मिट गई, कुछ समय बाद उस समाज ने अस्तित्व खो दिया। इसीलिए देश के विभिन्न प्रांतों में बसे सिंधियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाषा को लेकर है। आज सिंधी समाज के युवा अपने इतिहास को नहीं जानते। वे अपने संतों, महात्माओं और देश के लिए कुर्बानी देने वाले शहीदों को नहीं जानते। देश में सिंधी समाज का इतिहास कहीं नहीं पढ़ाया जाता, तो ऐसा होना स्वाभाविक भी है।


सिंधी समाज ने आजादी के बाद विस्थापन का जो दर्द झेला है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। जिस पीढ़ी ने वह दर्द भोगा और वेदना का वो मंजर देखा है वह लगभग खत्म हो गई है। मौजूदा पीढ़ी तो सिर्फ बुजुर्गों से सुने दर्द को महसूस कर सकती है। लेकिन सिंधी विस्थापित संघर्ष करते हुए न केवल अपने पैरों पर खड़े हुए, बल्कि देश के आर्थिक विकास में भी योगदान दिया। जब-जब पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार की खबरें आती हैं, विस्थापन की वह कहानियां आंखों को आंसू से भर देती हैं। यह दर्द है सिंधी समाज का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करने वाले विभिन्न राज्यों के सिंधी विधायकों का भी है। इस समाज ने 1950 से 1960 तक के दशक में अपने लिए नई जड़ों की तलाश में पीड़ा और रुदन के बीच क्या-क्या नहीं सहा। सामान्य जीवनयापन के लिए हर उस व्यवसाय में जहां जगह मिली, स्वीकार करके यह समाज आगे बढ़ा। 1970 आते-आते इस समाज ने एकता के बल पर, अपने लिए खड़े होने की जगह बनाई। यह वह समय था, जब इस समाज को बोली और वस्त्रों से पहचाना जा सकता था। रोटी-रोजी की व्यवस्था के बाद यह समाज उच्च शिक्षा और बड़े व्यवसायों की ओर बढ़ा तथा राजनीति में भी अपनी भूमिका दर्ज की। जिस सिंधी भाषा को कभी हास्य और विनोद में लिया जाता था, उस सिंधी भाषा ने शीघ्र ही गंभीर प्रतिष्ठा हासिल कर ली। सिंधी समाज ने हिंदी को इतनी तेजी से अपनाया कि आज उनके शुद्ध उच्चारण से सुनने वाले खुश हो जाते हैं। आज की जिस वरिष्ठ पीढ़ी ने जड़ों से कटकर आए सिंधी समाज की संघर्ष यात्रा को अपनी आंखों से देखा है। वह उसे याद करके आज भी करुणा से भर जाते हैं, लेकिन उसकी सफलता पर गर्व भी होता है। आज सिंधी समाज अपनी विशिष्ट और भद्र पहचान के साथ देश और राज्य का प्रमुख अंग है। सिंधी भाषाई जानकारों का कहना है कि एक पीढ़ी का जीवन अपनी रोजी रोटी जमाने में गुजर गया। दूसरी पीढ़ी अपनी संस्कृति को बचाते गुजर गई। अब तीसरी पीढ़ी समाज के अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है। सिंधी समाज के लोगों ने अपने दम पर प्रगति की है। अब युवाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है। हमारे पास कोई राज्य नहीं है। इससे इनकी संस्कृति और भाषा का प्रचार-प्रसार नहीं हो रहा है। अलग-अलग प्रांतों में फैले होने की वजह से सिंधी माहौल नहीं है। समाज को एक नयापन लाने की कोशिश करनी चाहिए। सिंधी हमेशा से सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते रहे हैं। इसी का नतीजा है कि वे जहां भी बसे हैं, वहां स्कूल, कॉलेज और अस्पताल खोले हैं, जिनमें दूसरे समाज के लोग भी बिना किसी भेदभाव के पढ़ाई करते हैं।


देश में विस्थापित होकर आए हिंदुओं को 2 साल में नागरिकता देने का कानून था। बाद में इसे 5 और 7 साल कर दिया गया। अब कई साल हो गए और कई सिंधियों को नागरिकता नहीं मिली है। जो लोग पाकिस्तान से आए, उन्हें उल्हासनगर, चेंबूर, ठाणे कोपरी आदि क्षेत्र में जमीन दी गई। उस समय 7/12 पर महाराष्ट्र सरकार का नाम रह गया था। तब यह नाम गलती से रह गया था, जो अब समाज के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अन्य राज्यों में सिंधियों को बसाने के बाद उनके नाम पर जमीन हस्तांतरित कर दी गई थी, लेकिन महाराष्ट्र में नहीं हो पाई। उस समय कुछ लोगों को जमीनें लीज पर दी गई थी, जिसकी अवधि अब पूरी हो गई है। अब इस जमीन को स्थायी रूप से संबंधित व्यक्तियों के नाम पर करने की मांग हो रही है। समाज में आज 15 प्रतिशत से अधिक लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं।


विभाजन के बाद अनाथ हो गए सिंधी
बंटवारे में पंजाबियों को आधा पंजाब और बंगालियों को आधा बंगाल मिला, लेकिन सिंधी समाज को मां से अलग कर दिया गया। इनके पूर्वजों को अनाथ कर दिया गया। इसके बाद भारत आए सिंधी देशभर में छिटक गए। यही वजह है कि सिंधियों की बातों को सरकार नहीं सुन रही। अगर सिंधी भी एक जगह बसे होते, तो इनकी बातों को सुना जाता और सरकार को झुकना भी पड़ता। केंद्र और राज्य में चाहे किसी भी पार्टी की सरकारें रही हों, सभी ने जहां-जहां सिंधी समाज के लोग बसे हैं, उस क्षेत्र के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया है। सभी ने व्यक्तिगत रूप से मेहनत करके शोहरत पाई है, लेकिन एकजुट नहीं हो पाए। इसी वजह से इनकी आवाज सरकार को सुनाई नहीं पड़ती। अगर सब एक मंच पर आएं, तो किसी सरकार की हिम्मत नहीं है कि वह इनकी आवाज को अनसुना कर दे। ये शून्य से शिखर तक पहुंचे हैं। अब इनके सामने छत, भाषा और सिंधियत को बचाने की चुनौती है। इनके पूर्वज विस्थापित होने के बाद 40 वर्ष तक रोजी-रोटी के लिए संघर्ष करते रहे, जिससे भाषा और संस्कृति पीछे छूट गई। सिंधी समाज के लोगों ने अपने दम पर प्रगति की है। अब युवाओं को बढ़ावा देने की जरूरत है। इनके पास कोई राज्य नहीं है। इससे इनकी संस्कृति और भाषा का प्रचार-प्रसार नहीं हो रहा है। अलग-अलग प्रांतों में फैले होने की वजह से सिंधी माहौल नहीं है। सिंधी हमेशा से सामाजिक दायित्व का निर्वाह करते रहे हैं।
विभाजन के बाद अनाथ हो गए सिंधी
सिंधी समाज के प्रतिनिधियों के मुताबिक, ‘बंटवारे में पंजाबियों को आधा पंजाब और बंगालियों को आधा बंगाल मिला, लेकिन हमें हमारी मां से अलग कर दिया गया। हमारे पूर्वजों को अनाथ कर दिया गया। इसके बाद भारत आए सिंधी देशभर में छिटक गए। यही वजह है कि हमारी बातों को सरकार नहीं सुन रही। अगर हम भी एक जगह बसे होते, तो हमारी बातों को सुना जाता और सरकार को झुकना भी पड़ता।’ सिंध समाज के प्रतिनिधियों ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा, ‘केंद्र और राज्य में चाहे किसी भी पार्टी की सरकारें रही हों, सभी ने जहां-जहां सिंधी समाज के लोग बसे हैं, उस क्षेत्र के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार किया है।’
सिंधी क्यों महसूस करते हैं उपेक्षित?
सर्वोमुखी प्रगति और सामाजिक जीवन में भरपूर योगदान के बावजूद सिंधी समुदाय खुद को उपेक्षित महसूस करता है। मुंबई और आस-पास के सिंधियों ने अपने आप को कॉस्मोपोलिटन माहौल में ढालते हुए बुलंदियां हासिल कीं। अपने कारवां में सभी जातियों, वर्गों और धर्मों को अपने साथ लेकर चले। सिंधी जाति का शुरू से एक विजन रहा है कि जो भी करना है, ज्यादा से ज्यादा अच्छा करना है। कौनसा क्षेत्र ऐसा है जहां सिंधी लोगों ने कमाल नहीं दिखाया। खास लोगों ही नहीं मेहनतकश लोगों का भी समुदाय के भाग्य निर्माण में बड़ा योगदान है। पर इस संघर्ष में एक महत्वपूर्ण चीज उनके हाथों से छिनती जा रही है, वह है उनकी संस्‍क़ृति, उनकी पहचान। दुर्भाग्य से जो उनकी बड़ी पहचान है। जीवन की भागमभाग में सिंधी मीडियम स्कूल बंद होते जा रहे हैं और खुद सिंधी लोगों ने आहिस्ता-आहिस्ता घरों में सिंधी भाषा बोलना कम कर दिया है। यह हालत उस मुंबई की है, जहां देश में सबसे ज्यादा सिंधी रहते हैं।
सिंधी भाषा के विकास के लिए अलग सेल बने
सिंधी समाज उस नदी के प्रवाह की तरह है, जो अपनी राह खुद बना लेता है। समाज की पंचायती व्यवस्था और संगठनात्मक मजबूती के सोच ने ही विस्थापित सिंधियों को स्थापित किया है। सिंधी भाषा के विकास के लिए राज्यों में अलग सेल होना चाहिए। सिंधी अकादमियां संस्कृति के विकास के लिए काम कर सकती हैं शिक्षा के लिए नहीं। अब संस्कृति को बचाने का संघर्ष इनके सामने हैं। इसके लिए सामाजिक स्तर पर तो प्रयास हो रहे हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर भी ईमानदार प्रयासों की भी अपेक्षा है। कुल मिलाकर सिंधी समाज की इस समस्या को दूर करने के लिए केंद्र सरकार को तुरंत कोई निर्णय लेना चाहिए, ताकि भारत में जाति और धर्म से जुड़ी इन परिर्चचाओं में रोक लगाई जा सके।
धर्मांतरण भी है समस्या
सिंधी समाज के लोगों ने धर्मांतरण करने वाले सिंधियों पर चिंता जताई है। उनके मुताबिक, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को बरगलाकर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है। समाज के पूर्वजों ने धर्म परिवर्तन न करके भारत आना उचित समझा। अगर उन्हीं के वंशज लालच में आकर परिवर्तन करते हैं, तो ऐसे लोगों का समाज बहिष्कार करेगा।

इनका कहना है-
· हमारे सिर पर छत की समस्याएं विकट होती जा रही हैं। यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित हो रही है। इसे सुलझाने के लिए सभी सिंधियों को एकजुट होना पड़ेगा। हमें अपने हक, भाषा और संस्कृति के लिए अपनी ताकत दिखानी होगी। – पहलाज निहलानी, डायरेक्टर-प्रोड्यूसर


· अब तक देश में जो भी सरकारें आई हैं, वे सिंधी समाज को लेकर उदासीन रहीं हैं। हमारे सामने राष्ट्रीयता और विभाजन के बाद यहां आने पर मिली जमीन का बड़ा मुद्दा है। इसे सुलझाने के लिए राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक प्रयास करूंगा।

गुरमुख जगवानी, पूर्व विधायक


· सिंधी समाज के सामने अपनी भाषा और संस्कृति को बचाना एक चुनौती है। इसके लिए हमारे शैक्षणिक संस्थानों में गर्मी की छुट्टियों और अन्य अवसरों पर विशेष प्रयास करने होंगे। हम अपनी भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए प्रतिबद्ध हैं।

महेश तेजवानी, प्रेसिडेंट, स्वामी विवेकानंद एजुकेशन सोसायटी


· हमारे बच्चे सिंधियों की प्राचीन सभ्यता और संस्कृति से अनभिज्ञ हैं। जिन युवाओं को थोड़ी रुचि भी है, उन्हें भी अधूरी अथवा कम जानकारी है। इसीलिए हम अपनी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखने और उसका प्रचार-प्रसार करने के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे।

– डॉ. राम जवाहरानी, चेयरमैन, ग्लोबल सिंधी काउंसिल


· सिंधियों के बड़े केंद्र उल्हासनगर को मिनी पंजाब कहा जाता है। यह एक औद्योगिक शहर है। बड़ी संख्या में यहां के कारखाने बंद पड़े हैं। इससे 1 लाख से अधिक लोग बेरोजगार हुए हैं। इसे फिर से शुरू करवाने के प्रयास में लगी हूं। यहां की सड़कें खराब हैं। इसे सरकार के सामने उठाऊंगी।

ज्योति कालानी, विधायक, उल्हासनगर


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