केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री कॉप-27 में “एक्सिलेरेटिंग रेज़िलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर इन स्मॉल आइलैंड डेवलपिंग स्टेट्स (सिड्स)” विषयक सत्र में सम्मिलित हुए

विशेष बिंदुः

• ‘इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर रेज़िलिएंट आइलैंड स्टेट्स’ (द्वीपीय देशों के लिए सर्व-सक्षम अवसंरचना- आईआरआईएस) की परिकल्पना प्रस्तुत की गई

 आईआरआईएस के तहत परियोजनाओं की शुरुआत करने के सम्बन्ध में प्रथम प्रस्तावों के लिए आह्वान’ की घोषणा की गई

 आईआरआईएसभारत की लाइफ पहल के दर्शन से ओतप्रोत

आज कॉप-27 के दौरान यूएनएफसीसीसी मंडप में “एक्सिलेरेटिंग रेज़िलिएंट इंफ्रास्ट्रक्चर इन स्मॉल आइलैंड डेवलपिंग स्टेट्स (लघु द्वीपीय विकासशील देशों में सर्व-सक्षम अवसंरचना को गति देना- सिड्स)” विषयक सत्र का आयोजन किया गया। केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु मंत्री श्री भूपेन्द्र यादव, मॉरीशस के पर्यावरण, ठोस अपशिष्ट और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री काव्यदास रामानो, जमैका के आर्थिक विकास एवं रोजगार सृजन मंत्री सिनेटर मैथ्यू सामूडा तथा एओएसआईएस और फीजी के प्रतिनिधियों ने इस सत्र में हिस्सा लिया।

 

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इस सत्र का एजेंडा आईआरआईएस का दृष्टिकोण प्रस्तुत करना और ‘प्रस्तावों के आह्वान’ की घोषणा करना था। सत्र का केंद्रीय विषय आईआरआईएस परिकल्पना 2022-2030 था, जिसके जरिये उन प्रमुख घटकों पर गौर करना था, जो ‘प्रस्तावों के आह्वान’ के तहत आईआरआईएस परियोजनाओं के क्रार्यान्वयन में सहायता करेंगे। आईआरआईएस ऐसी प्रथम पहल होगी, जिसे इंफ्रास्ट्रक्चर रेज़ेलियंस एक्सिलेरेटर फंड (आईआरएएफ) के जरिये शुरू किया जायेगा। इसे कॉप-27 में पिछले सप्ताह आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन (सीडीआरआई) द्वारा आरंभ किया गया था।

अपने प्रमुख वक्तव्य में श्री भूपेन्द्र यादव ने कहाः

“यह मेरे लिये हर्ष का विषय है कि आईआरआईएस की परिकल्पना प्रस्तुत करने के समय मैं आज आप सबके बीच हूं। इसे पूरे विश्व के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है तथा आईआरआईएस के तहत परियोजनाओं की शुरुआत करने के लिए प्रस्तावों के आह्वान की घोषणा की जा रही है।

जैसा कि आपको पता है, आईआरआईएस एक प्रमुख रणनीतिक पहल है, जिसे एक ऐसे उपकरण के तौर पर तैयार किया गया है, जिसके जरिये अत्यधिक कमजोर देशों के मामले में सिड्स को जलवायु अनुकूल समाधान देने में आसानी होगी।

आईआरआईएस सह-सृजन और पूरकता के प्रमुख सिद्धांतों पर आधारित है तथा उसे कॉप-26 के विश्व शासनाध्यक्षों के शिखर सम्मेलन में भारत, ऑस्ट्रेलिया, जमैका, मॉरीशस और फीजी ने आरंभ किया था। यह एक संयुक्त मंच है, जो सिड्स के हवाले से सर्व-सक्षम अवंसरचना के समाधानों को सीखने, उन्हें साझा करने और उनके क्रियान्वयन में सहायक है।

देवियो और सज्जनो, प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार बदलते जलवायु कानूनों के तहत सिड्स के हितों की रक्षा करने के लिये दृढ़ प्रतिज्ञ है।

आज हम जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन सभी अन्य पर्यावरण सम्बन्धी चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती है। समग्र उत्सर्जन को रोके बगैर, अगर हम पर्यावरण की चुनौतियों से छुटकारा भी पा लें, तब भी उससे अधिक समय तक काम नहीं चलने वाला।

जलवायु परिवर्तन में बहुपक्षीय सहयोग और आंतरिक स्तर पर कार्रवाई करने के लिये भारत संकल्पित है। हम मनुष्य जाति के इस घर की रक्षा करने में समस्त वैश्विक पर्यावरण सम्बन्धी समस्याओं से अपनी लड़ाई जारी रखेंगे। लेकिन, ग्लोबल वॉर्मिंग हमें चेताती है कि समानता और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के बिना कुछ नहीं होगा। इसके लिये कोई भी पीछे न छूटने पाये, क्योंकि सफलता की यहीं कुंजी है। इस मामले में जो लोग सौभाग्यशाली हैं, उन्हें आगे बढ़कर रास्ता दिखाना होगा। कोई भी देश अकेले यह सफर तय नहीं कर सकता। सही समझ, सही विचार और सहयोगात्मक कार्रवाई– अगली निर्णायक अर्धशती के लिये हमारा मार्ग प्रशस्त करेगी।

मित्रो,

आईपीसीसी की एआर6 रिपोर्ट हमें साफ बताती है कि वातावरण गर्म होने की जिम्मेदारी सीधे तौर पर सीओ2 के लिए समग्र उत्सर्जन में हमारे आनुपातिक योगदान पर आधारित है। सभी सीओ2 उत्सर्जन, चाहे वे जहां भी उत्पन्न हों, वे समान रूप से वातावरण को गर्म करने में भूमिका निभाते हैं।

आईपीसीसी रिपोर्टें और अन्य उत्कृष्ट उपलब्ध विज्ञान बताते हैं कि भारत उन देशों में शामिल है, जो जलवायु परिवर्तन के मामले में बहुत संवेदनशील है। लिहाजा, हम द्वीपीय देशों व अन्य की परिस्थितियों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। भारत की तटरेखा 7500 किलोमीटर से अधिक है और यहां आसपास के समुद्री क्षेत्र में 1000 से अधिक द्वीप मौजूद हैं। हमारी एक बड़ी तटीय आबादी आजीविका के लिये समुद्र पर निर्भर है। इसलिये हम भी विश्व पैमाने पर बहुत संवेदनशील देशों में आते हैं। इसका उदाहरण यह है कि 1995-2020 के बीच 1058 जलवायु आपदा घटनायें दर्ज की गईं।

प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आधार पर अगर वस्तुनिष्ठ तुलना की जाये, तो भारत का उत्सर्जन आज भी वैश्विक औसत का लगभग एक-तिहाई ही है। अगर पूरी दुनिया प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आधार पर भारत जितना उत्सर्जन करने लगे, तो उपलब्ध विज्ञान से हमें पता चलता है कि जलवायु संकट पैदा ही नहीं होगा।

मुझे विश्वास है कि आज की बैठक आईआरआईएस परियोजनाओं के क्रियान्वयन में दीर्घकालीन परिकल्पना से काम लेगी। जो परिकल्पना यहां तय की जायेगी, उससे सिड्स को यह अवसर मिलेगा कि वह उभरते संसाधनों व क्षमताओं द्वारा सबसे बड़ी अवसंरचना चुनौतियों का समाधान कर सके।

देवियो और सज्जनो, आईआरआईएस के जरिये भारत वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को फलीभूत कर रहा है तथा सभी साझीदारों के साथ जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए प्रतिबद्धता जाहिर करता है, ताकि यह ग्रह सबके लिये बेहतर और सुरक्षित स्थान बन सके।

अंत में मैं प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का उद्धरण प्रस्तुत करूंगा, जिन्होंने आईआरआईएस के सार-तत्व को प्रभावशाली तरीके से दर्शाया है। वे कहते हैं:

सीडीआरआई या आईआरआईएस केवल अवसंरचना का मुद्दा नहीं हैबल्कि यह मानव कल्याण के अति संवेदनशील दायित्व का हिस्सा है। मानवजाति के प्रति यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। एक तरह से यह हमारे पापों का सामूहिक प्रायश्चित है।

सीडीआरआई और आईआरआईएस

आपदा रोधी अवसंरचना गठबंधन (सीडीआरआई) का आरंभ माननीय प्रधानमंत्री ने सितंबर 2019 को न्यू यॉर्क में किया था। इसका उद्देश्य है नई और मौजूदा अवसंरचना प्रणालियों को जलवायु व आपदा जोखिमों के अनुरूप सर्व-सक्षम बनाना, ताकि सतत विकास को सहायता मिल सके। सीडीआरआई सर्व-सक्षम अवसंरचना के तेज विकास को प्रोत्साहित करता है, ताकि सतत विकास लक्ष्यों पर खरा उतरा जा सके। उल्लेखनीय है कि सतत विकास लक्ष्यों के तहत मूलभूत सेवाओं तक सबकी पहुंच बनाना तथा समृद्धि और बेहतर कामकाज का मार्ग प्रशस्त करना शामिल है।

भारत सरकार आईआरआईएस की तैयारी के समय से ही उसे चलाने के लिये गठबंधन को समर्थन देता आया है। आईआरआईएस के जरिये भारत सरकार विश्वभर के सिड्स को समर्थन देता है, ताकि आपदा व जलवायु परिवर्तन के जोखिमों के मद्देनजर सिड्स की नई व मौजूदा अवसंरचना सर्व-सक्षम बन सके।

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