उपचुनावों में आदिवासी रहेंगे मुख्‍य भूमिका में – बीजेपी पर भारी पड़ेगी आदिवासी की नाराजगी

  • मध्यप्रदेश के उपचुनाव …………
  • आदिवासियों के अधिकारों को लिए कमलनाथ ने उठाई आवाज
  • विजया पाठक


मध्‍यप्रदेश में होने वाले उपचुनावों की तारीखों को ऐलान हो गया है। 31 अक्‍टूबर को प्रदेश में एक लोकसभा और तीन विधानसभाओं के उपचुनाव होने हैं। इसके साथ ही राज्‍य की दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी ने भी तैयारियां शुरू कर दी हैं। उम्‍मीदवारों के चयन में जातिगत गुणा-भाग भी होने लगे हैं इन सब में आदिवासी वर्ग महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मौजूदा हालात में धार बालात्‍कार एवं हत्‍याकाण्‍ड से पूरा आदिवासी समाज खासतौर पे प्रदेश में काफी रोष में है। जबसे प्रदेश में कमलनाथ का नेतृत्‍व आया है तब से आदिवासियों का पूरा साथ कांग्रेस को मिला है। कमलनाथ ने भी हमेशा से आदिवासियों के हक की लड़ाई लड़ने में कोई कोरकसर नही छोड़ी। हाल ही में उन्‍होंने प्रदेश के कई क्षेत्रों में आदिवासी अधिकार यात्राएं निकाली। जिसका वर्तमान शिवराज सरकार पर भी काफी असर हुआ, सरकार भी आदिवासियों की अधिकार की बातें करने लगी और आदिवासियों को लेकर कई योजनाओं की घोषणाएं की और अमित शाह को भी जबलपुर में आकर आदिवासियों के पक्ष में सम्‍मेलन करना पड़ा।
*इस बार के उपचुनाव में आदिवासी वर्ग बाज़ी पलटेगा।*
आने वाले उपचुनाव में बीजेपी को आदिवासियों की नाराजगी का खामियाजा उठाना पड़ेगा। 2023 से पहले निश्चित ही भाजपा आलाकमान मुख्यमंत्री का चेहरा बदलेगी पर उससे स्थिति और विकट दिखेगी। एक तरफ नए मुख्यमंत्री के पास चुनाव के लिए काम समय रहेगा उसके साथ ही कांग्रेस से भाजपा में आए मंत्री जिन्होंने भ्रष्टाचार कर करके सरकार की और किरकरी कर दी उसके कारण अपने भाजपा के नेता और कार्यकर्ता को मोटिवेट करना मुश्किल दिख रहा है। शिवराज सिंह जैसा पकड़ वाला नेता ने सरकार जैसे तैसे खीच दी नए वैसे में नए मुख्यमंत्री के लिए यह कांटो भरा ताज होगा। भाजपा इसके काउंटर में कोई आदिवासी मुख्यमंत्री घोषित कर दे तो प्रदेश की कुल 20 प्रतिशत जनसंख्या इनके साथ जाता दिखेगा वरना मौजूदा परिपेक्ष में मध्यप्रदेश में आदिवासी कांग्रेस के साथ खड़ा है।
पिछले 10 वर्षों से मध्यप्रदेश में बीजेपी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व ने स्थिर दिखी है। थोड़ी बहुत आपसी खींचतान को छोड़ दे भाजपा के सभी बड़े नेता जैसे उमा भारती, कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र तोमर, गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा, लक्ष्मीकांत शर्मा साथ में संगठन से कप्तान सिंह सोलंकी, माखन सिंह, अरविंद मेनन, सुहास भगत आदि के नेतृत्व में मध्यप्रदेश के चप्पे-चप्पे में परचम फहराती नजर आती थी। वह ऐसा दौर था जब भाजपा के सामने मध्यप्रदेश में कोई नहीं था। थोड़ी बहुत अंतर्कलह को छोड़ दें बाकी सब एक और मजबूत दिखते थे। आज भी मध्यप्रदेश भाजपा में शिवराज सिंह से बड़ा कोई चेहरा नहीं दिखता। इसके ठीक उलट मध्यप्रदेश में उस समय पूरी कांग्रेस लाचार दिखती थी। ना कोई नेतृत्व दिखता था न नेता। जिसकी जैसी मर्जी जान पड़ती थी वैसा करते थे और चुनाव पे चुनाव हारते जाते थे। फिर आया 2018 मध्यप्रदेश में 15 साल के एंटी इनकंपबेंसी और प्रदेशवासियों के बदलाव के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के फ्रेश और सोर्टेड कैंपेन से भाजपा यहां हर गई और मध्यप्रदेश में कमलनाथ राज आया। सरकार बनने के बावजूद कमलनाथ कांग्रेस के उस समय मध्यप्रदेश में सिरमौर नहीं बन पाए थे, यहां के लोगों और कांग्रेस के रूट लेवल कार्यकर्ता के लिए वे नए जैसे थे पर जैसे-जैसे सरकार आगे बढ़ी, वो मजबूत होते गए। ज्योतिरादित्य और दिग्विजय सिंह का भी मंत्रिमंडल और सरकार में भारी दबदबा रहता था। पर पूरा समीकरण मार्च 2020 में बदल गया। ज्योतिरादित्य ने गद्दारी कर पाला बदल लिया और यही से मध्यप्रदेश भाजपा की पूरी तस्वीर बदल गई। महाराज के साथ उनके कुछ 22-25 विधायक आ गए और पूरी भाजपा बुझे मन से उनको उपचुनाव जिताने में लग गए। जैसे ही यह सभी चुनाव जीतकर आए भाजपा पूरी तरह बदल गई। पैराशूट जैसे ज्योतिरादित्य को रातोंरात मध्यप्रदेश भाजपा में बड़ा नेता बना दिया गया। आलाकमान का आदेश का पालन करने सबने उनको और उनके समर्थकों को जहां मिला वहां स्थान दिया। चाहे वीडी शर्मा हो, नरेंद्र तोमर या कैलाश विजयवर्गीय सबने उनके लिए जगह बना दी। पर इस 1.5 साल में मध्यप्रदेश भाजपा कमजोर होती गई साथ में शिवराज सिंह भी प्रदेश में अपनी पकड़ खोते नजर आए। आम कार्यकर्ता जो की भाजपा की असली ताकत है उसको यह अदला बदली अच्छी नहीं लगी। इसके ठीक उलट मध्य प्रदेश कांग्रेस में कमलनाथ सबसे ताकतवर और एकमात्र नेता के रूप में स्थापित हो गए। उनकी ताकत बाद में दमोह उप चुनाव में देखने को मिली। प्रदेश के हर कोने से कांग्रेस का कार्यकर्ता अब कमलनाथ से जुड़ता दिख रहा है और उनकी संगठन पर मजबूत पकड़ दिख रही है। निश्चित ही आने वाले उप चुनाव में और 2023 में यह सब सामने नजर आएगा।

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